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क्वारंटिन पर गए बदरीनाथ धाम के रावल

उत्तराखंड के अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है बदरीनाथ धाम अर्थात बदरीनारायण मंदिर. जिसका जिक्र हिन्दू धर्म के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में शामिल चार धामों में एक धाम के रूप में किया गया है. इस मंदिर में भगवान विष्णु के बद्रीनारायण रूप की पूजा होती है. यहां की मूर्ति शालिग्राम पत्थर से निर्मित है जिसके बारे में यह मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने नारद कुंड से निकालकर स्थापित किया था. इस मंदिर का जिक्र विष्णु पुराण,महाभारत व स्कंद पुराण जैसे हिंदू धर्म के अनेकों प्राचीन व मान्य ग्रंथों में मिलता है.

क्वारंटिन पर गए रावल :

श्री बदरीनाथ धाम के रावल ईश्वरी प्रसाद नम्बूदिरी सोमवार को ऋषिकेश पहुंचे. एम्स ऋषिकेश में उनका कोविड-19 का परीक्षण किया गया. इसके बाद वे मुनि की रेती स्थित शिवानंद आश्रम में स्वयं क्वारंटिन के लिए चले गए हैं. उसके बाद ही उनके द्वारा मंदिर में पूजा की जाएगी. चिकित्सकों के अनुसार वह पूरी तरह स्वस्थ पाए गए है. बता दें कि इस साल 2020 में बदरीनाथ का कपाट खोलने की तिथि को बदल दी गई है और मंदिर के कपाट अब 15 मई को खुलेंगे. रावल विशेष अनुमति लेकर केरल से सड़क मार्ग के द्वारा ऋषिकेश पहुंचे हैं.

केरल के रावल ही होते हैं पुजारी :

इस मंदिर में पूजा करने वाले पुजारी की कहानी बेहद दिलचस्प है.यह मंदिर स्थिति तो उत्तर भारत में है लेकिन इस मंदिर में पूजा करने का अधिकार केवल दक्षिण भारत स्थित केरल राज्य के “रावल” ब्राह्मण को ही है.ये ब्राह्मण केरल के नम्बूदरी सम्प्रदाय के होते हैं.

कैसे शुरू हुई यह परंपरा :

ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा स्वयं शंकराचार्य ने शुरू की थी और केरल के रावल ब्राह्मण को शंकराचार्य का ही वंशज माना जाता है.कहा जाता है कि शंकराचार्य स्वयं केरल के कालड़ी गांव के थे जहां से उन्होंने पूरे देश में वैदिक धर्म के उत्थान और प्रचार का अलख जगाया. बदरीनाथ मंदिर समिति से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि शंकराचार्य ने ऐसा इसलिए किया ताकि हिंदू धर्म के लोग एकजुट हो सकें.इसलिए यह व्यवस्था की गई कि उत्तर भारत के इस मंदिर में दक्षिण भारत का पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिर में उत्तर भारत का पुजारी रहे. जैसा कि रामवेश्वरम में उत्तर भारत के पुजारी ही नियुक्त होते हैं.

कैसे होता है रावल का चयन :

केरल के नम्बूदरी ब्राह्मणों में रावल का चयन बदरीनाथ मंदिर समिति ही करती है. इन्हें वहां के वेद-वेदांग विद्यालय का स्नातक या शास्त्री की उपाधि होने के साथ-साथ ब्रह्मचारी होना जरूरी है. नए रावल की नियुक्ति में त्रावणकोर के राजा की सहमति ली जाती है तभी रावल नियुक्त होते हैं.

साल के छह महीने जब भारी हिमपात के कारण मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं तब रावल अपने घर यानी केरल चले जाते हैं और कपाट खुलने की तिथि पर वापस आते हैं और वही पूजा करते हैं. कहा जाता है कि हजार साल से अधिक समय में आज तक कई बार यह मंदिर उजड़ा और बसा लेकिन इस परंपरा पर ना ही स्थानीय पुरोहितों ने कोई उंगली उठाई और ना ही आज तक इस परंपरा को कोई आंच आई .

source : – prabhatkhabar

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